भारत और रूस के बीच साझेदारी दशकों पुरानी है, लेकिन अब यह रिश्ता एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। रक्षा से लेकर ऊर्जा और कृषि तक, दोनों देश ऐसे प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं जो आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति का रुख बदल सकते हैं। अमेरिका की चेतावनियों के बावजूद भारत ने यह साबित किया है कि वह अपनी आर्थिक और रणनीतिक नीतियाँ स्वतंत्र रूप से तय करेगा।
रक्षा क्षेत्र में नई साझेदारी
भारत और रूस की दोस्ती का सबसे मजबूत आधार रक्षा सहयोग रहा है। एस-400 मिसाइल सिस्टम की डिलीवरी के बाद अब दोनों देश एस-500 और ब्रह्मोस मिसाइल प्रोजेक्ट पर भी चर्चा कर रहे हैं। माना जा रहा है कि यह साझेदारी भारत की वायुसेना की ताकत को और मजबूत करेगी। इसके अलावा, रूस के साथ 10,000 करोड़ रुपये से अधिक के नए सौदों पर भी बातचीत जारी है, जिसमें उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइल तकनीक शामिल हैं। ये समझौते भारत को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने में अहम भूमिका निभाएँगे।
ऊर्जा और व्यापार में बढ़ती निकटता
भारत ने अब अपनी आर्थिक रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। पहले जहाँ व्यापार मुख्य रूप से तेल पर केंद्रित था, वहीं अब भारत रूस से ऊर्जा के साथ-साथ कृषि, औषधि और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी सहयोग बढ़ा रहा है। भारतीय दवाइयाँ, मशीनरी और खाद्य उत्पाद रूस में बड़ी मात्रा में निर्यात किए जा रहे हैं। समुद्री उत्पादों और फलों-सब्जियों का व्यापार भी तेजी से बढ़ा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत अब पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़कर नए अवसर तलाश रहा है।
अमेरिकी दबाव के बीच भारत की रणनीति
अमेरिका की ओर से बार-बार दबाव डाला जा रहा है कि भारत रूस से अपने व्यापारिक संबंध सीमित करे। डोनाल्ड ट्रंप ने भी हाल ही में यह दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी रूस से तेल की खरीद घटाएँगे। हालांकि, भारत ने इस तरह के दावों पर कोई टिप्पणी नहीं की और अपने हितों को सर्वोपरि रखा। अमेरिका द्वारा लगाए गए भारी टैरिफ के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है, और निर्यात में आई अस्थायी गिरावट से सरकार बेफिक्र दिख रही है।
नए बाजारों की खोज
भारत अब अमेरिका और यूरोप के पारंपरिक बाजारों से आगे बढ़कर एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देशों में व्यापार विस्तार पर ध्यान दे रहा है। UAE, ब्राजील, वियतनाम, पोलैंड और थाईलैंड जैसे देशों के साथ नए व्यापारिक समझौते भारत के लिए बड़ी संभावनाएँ खोल रहे हैं। इससे भारत को न केवल आर्थिक स्थिरता मिल रही है, बल्कि वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में भी उभर रहा है।
निष्कर्ष
भारत-रूस की साझेदारी सिर्फ रक्षा सौदों या तेल खरीद तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसमें ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक विकास और भू-राजनीतिक संतुलन शामिल हैं। अमेरिका के दबाव के बावजूद भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि उसकी विदेश नीति “भारत प्रथम” के सिद्धांत पर आधारित है। आने वाले समय में यह संबंध न केवल भारत की सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि उसे विश्व राजनीति में और भी प्रभावशाली बनाएगा।